देवशयनी एकादशी व्रत शनिवार को, अगले चार महीने मांगलिक कार्य रहेंगे प्रतिबंधित: स्वामी पूर्णानंदपुरी जी महाराज

देवशयनी एकादशी व्रत शनिवार को, अगले चार महीने मांगलिक कार्य रहेंगे प्रतिबंधित: स्वामी पूर्णानंदपुरी जी महाराज

अलीगढ़ न्यूज़: भगवान विष्णु की आराधना को समर्पित एकादशी का वैदिक सनातन धर्म में विशेष महत्व है। आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी जिसे देवशयनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है, इस दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा में जाते हैं। साथ ही चातुर्मास का आरंभ भी इसी दिन से होता है।

वैदिक ज्योतिष संस्थान के प्रमुख स्वामी श्री पूर्णानंदपुरी जी महाराज ने देवशयनी एकादशी के विषय में जानकारी देते हुए बताया कि एकादशी तिथि शुक्रवार 24 जुलाई को प्रातः 09:12 मिनट से आरंभ हो रही है जो कि 25 जुलाई शनिवार को प्रातः11:34 मिनट तक रहेगी अतः उदया तिथि के अनुसार वैष्णव, शाक्त, निम्बार्क एवं ग्रहस्थ सहित सभी के लिए शनिवार को एकादशी व्रत मान्य रहेगा।

वहीं एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि में करना अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि द्वादशी तिथि में व्रत का पारण नहीं करने से पाप लगता है। स्वामी जी ने बताया कि पद्मपुराण के अनुसार एकादशी व्रत पारण के दिन व्रत करने एवं दान करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होकर जीवन में सुख शांति और आर्थिक खुशहाली में वृद्धि करते हैं।

चातुर्मास के विषय में जानकारी देते हुए उन्होंने बताया कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक चार महीने के अंतराल को चातुर्मास नाम से जाना जाता है। इस दौरान मांगलिक कार्यों के ईष्ट भगवान विष्णु योगनिद्रा में लीन रहने के कारण विवाह, मुंडन और गृह प्रवेश जैसे सभी मांगलिक कार्य वर्जित होते हैं साथ ही यह समय मुख्यतः उपवास, साधना, जप, दान के लिए विशेष महत्व रखता है।इन चार महीनों में साधक का प्रमुख लक्ष्य बाह्य उत्सवों की अपेक्षा आत्मिक उन्नति और ईश्वर साधना होना चाहिए।

चातुर्मास कि इस अवधि में जप, तप, ध्यान, स्वाध्याय, श्रीमद्भागवत एवं रामायण का श्रवण-पाठ, गीता अध्ययन, सत्संग, तीर्थ सेवा, गौ सेवा, अन्नदान, जलदान तथा जरूरतमंदों की सहायता का विशेष महत्व बताया गया है।

शास्त्रों में कहा गया है कि चातुर्मास में किए गए पुण्य कर्मों का फल सामान्य दिनों की अपेक्षा कई गुना अधिक प्राप्त होता है।ऋषि-मुनियों की परंपरा में चातुर्मास के दौरान एक स्थान पर रहकर साधना, प्रवचन और धर्म प्रचार का विधान रहा है। इस दौरान तामसिक भोजन, नशा, असत्य, क्रोध, हिंसा तथा अनैतिक आचरण से दूर रहकर भगवान का ध्यान करना चाहिये।

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