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17 अक्टूबर से भक्तों पर कृपा बरसाएंगी माता रानी, देवी आराधना का महापर्व है नवरात्री : स्वामी पूर्णानंदपुरी जी

Published: October 15, 2020 at 8:07 pm

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अलीगढ़- शारदीय नवरात्रि पर्व हिन्दू धर्म का एक प्रमुख त्योहार है। आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवरात्र पर्व शुरू होता है जो नवमी तिथि तक चलता है। देवी शक्ति की उपासना का यह पर्व 17 अक्टूबर से शुरू हो रहा है। नवरात्रि के पहले दिन जहां शुभ मुहूर्त में घटस्थापना करने का विधान है तो वहीं आखिरी दिन कन्या पूजन करके व्रत खोला जाता है। मां दुर्गा के धरती पर आगमन का विशेष महत्व होता है। देवीभागवत पुराण के मुताबिक नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा का आगमन भविष्य में होने वाली घटनाओं के संकेत के रूप में भी देखा जाता है।

हर साल नवरात्रि में देवी दुर्गा का आगमन अलग-अलग वाहनों में सवार होकर आती हैं अगर नवरात्रि का आरंभ सोमवार या रविवार के दिन होता है तब इसका अर्थ होता है माता हाथी पर सवार होकर आएंगी। अगर शनिवार और मंगलवार के दिन नवरात्रि का पहला दिन होता है तो माता घोड़े पर सवार होकर आती हैं।

वहीं गुरुवार या शुक्रवार के दिन नवरात्रि आश्विन शुक्ल पक्ष प्रतिपदा तिथि पर मां का आगमन होता तो माता डोली की सवारी करते हुए भक्तों को आशीर्वाद देने आती हैं। बुधवार के दिन नवरात्रि का पहला दिन होने पर माता नाव की सवारी करते हुए धरती पर आती हैं, उक्त बातों के साथ वैदिक ज्योतिष संस्थान के अध्यक्ष एवं परमपूज्य महामंडलेश्वर स्वामी श्री पूर्णानंदपुरी जी महाराज ने नवदुर्गा के विषय में विस्तृत जानकारी दी।

स्वामी श्री पूर्णानंदपुरी जी महाराज ने शारदीय नवरात्र के विषय में जानकारी देते हुए बताया कि इस बार नवरात्र आठ दिन के होंगे, अर्थात तिथियों के समय में उतार चढ़ाव के कारण नौ दिनों में ही दस दिनों का पर्व मनाया जायेगा। यानि 17 अक्टूबर को मां शैलपुत्री पूजा घटस्थापना से लेकर 25 अक्टूबर को मां सिद्धिदात्री की पूजा के साथ नवरात्रों का समापन होगा। 23 अक्टूबर शुक्रवार प्रातः 06:56 तक सप्तमी तिथि के उपरांत अष्टमी तिथि लग जाएगी जो 24 अक्टूबर को प्रातः 06:58 मिनट तक रहने के बाद नवमी तिथि लग जाएगी दो तिथियां एक दिन पड़ने के कारण अष्टमी और नवमी की पूजा एक ही दिन होगी। जबकि नवमी के दिन सुबह 07:41 मिनट के बाद दशमी तिथि आ रही है।

कलश स्थापन के विधि विधान एवं सामिग्री के विषय में जानकारी देते हुए स्वामी श्री पूर्णानंदपुरी जी महाराज ने बताया कि घड़ा और सकोरा, नारियल(पानी वाला), थोड़े से जौ और बालू या मिट्टी, चावल, कलावा, चुनरी, जनेऊ, कमल गट्टा 5, चांदी का सिक्का 1, सुपारी 3, लौंग के जोड़े 9, हल्दी की गांठ 3, इलायची 3, दूर्वाघास, फल 5 प्रकार के, मिष्ठान, अशोक के पत्ते, फूलमाला, बेलपत्र, पान का पत्ता 1, थोड़ी सी दरवाजे या चौराहे की मिट्टी

परात को धोकर या जमीन को पवित्र कर रोली से सतिया बनाये। जौ को गंगाजल से पवित्र कर बालू में मिलाकर परात में या जमीन पर रखें। घड़े की गर्दन पर कलावा बाँधे तथा घड़े पर रोली से 3 सतिये बनाये। सारी सामग्री(गंगाजल,कमलगट्टा, सुपारी, लौंग के जोड़े, हल्दी की गांठ, इलायची, दूर्वाघास,घर के दरवाजे या चौराहे की मिट्टी)व चांदी के सिक्के को कलश के जल में डाल दे। कलश में आम या अशोक के पत्ते लगाकर, सकोरे में चावल भरकर कलश पर रख दे।

चावलों के ऊपर नारियल रखकर उसे चुनरी और जनेऊ पहनाये। रोली व चावल से नारियल का टीका करके माला पहनाये, बेलपत्र, थोड़ा इत्र( रुई में लगाकर) गुलाल या हल्दी व दुर्वाघास भी चढ़ाये। फल और मिठाई के ऊपर पान का पत्ता रखकर भोग लगाये। प्रतिदिन मातारानी की आरती व पाठ कर अपने परिवार की मंगल कामना व समृद्धि के लिए प्रार्थना कर प्रणाम करे।




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