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विशेष फलदायी है भाद्रपद अमावस्या : स्वामी पूर्णानंदपुरी जी

Published: August 17, 2020 at 10:47 pm

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अलीगढ़- ज्योतिष शास्त्र के अनुसार हर अमावस्या पर पित्र तर्पण किया जाता है और इसका अपना एक विशेष महत्व होता है लेकिन भादों की अमावस्या के दिन दान और पितृ तर्पण का विशेष महत्व होता है, इस अमावस्या को पिठौरी व कुशग्रहणी अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है, भाद्रपद मास की यह अमावस्या भगवान श्री कृष्ण को समर्पित है। इस वर्ष कुशोत्पाटनी अमावस्या 19 अगस्त बुधवार को है यह जानकारी महामंडलेश्वर स्वामी श्री पूर्णानंदपुरी जी महाराज ने दी।

महामंडलेश्वर स्वामी श्री पूर्णानंदपुरी जी महाराज ने भाद्रपद अमावस्या के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि धार्मिक दृष्टि से यह तिथि बहुत महत्वपूर्ण होती है, पितृ दोष से मुक्ति पाने के लिये इस तिथि का विशेष महत्व होता है, क्योंकि इस तिथि को तर्पण, स्नान, दान आदि के लिये बहुत ही पुण्य फलदायी माना जाता है, भाद्रपद अमावस्या तिथि 18 अगस्त को 10 बजकर 39 मिनट पर आरम्भ होकर 19 अगस्त को 08 बजकर 1 मिनट पर समाप्त होगी।

इस अमावस्या के दिन कुशा उखाड़ने का भी महत्व है, माना जाता है कि कुशोत्पाटनी अमावस्या पर उखाड़ा गया कुश 1 वर्ष तक प्रयोग किया जा सकता है। कुश एक विशेष प्रकार की घास होती है, जिसको हमारे शास्त्रों में विशेष शुद्ध माना गया है इसका उपयोग धार्मिक कार्यों के आलावा ग्रहण काल के समय खाने की वस्तुओं को दूषित होने से बचाने में, पूजा के समय शुद्धता की द्रष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

स्वामी जी ने बताया कि अमावस्या तिथि पर भगवान शिव और माता पार्वती का पूजन करना शुभ माना जाता है, इस तिथि पर पितरों का तर्पण करने का विधान है, यह तिथि चंद्रमास की आखिरी तिथि होती है अतः इस तिथि पर गंगा स्नान और दान का महत्व बहुत है वहीँ इस दिन क्रय-विक्रय और सभी शुभ कार्यों को करना वर्जित है साथ ही अमावस्या के दिन खेतों में हल चलाना या खेत जोतने को भी वर्जित माना गया है।

कुश उखाड़ने के नियम की जानकारी देते हुए उन्होंने बताया कि प्रात: काल स्नान के उपरांत सफेद वस्त्र धारण कर कुश उखाड़ते समय अपना मुख उत्तर या पूर्व की ओर रखकर ॐ नाम का उच्चारण करते हुए कुश का स्पर्श करें, तत्पश्चात विरंचिना सहोत्पन्न परमेष्ठिनिसर्जन। नुद सर्वाणि पापानि दर्भ स्वस्तिकरो भव॥ का उच्चारण करते हुए हथेली और अंगुलियों के द्वारा मुट्ठी बनाकर एक झटके से कुश उखाड़ें। कुश को एक बार में ही उखाड़ना चाहिए उसे लकड़ी के नुकीले टुकड़े से ढीला कर लें।




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