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29 सितम्बर से प्रारंभ होंगे शारदीय नवरात्र : स्वामी पूर्णानंदपुरी जी महाराज

Published: September 27, 2019 at 6:12 pm

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वीपीएल न्यूज़, अलीगढ़- नवरात्र वह समय है, जब दोनों ऋतुओं का मिलन होता है। इस संधि काल मे ब्रह्मांड से असीम शक्तियां ऊर्जा के रूप में हम तक पहुँचती हैं। मुख्य रूप से हम दो नवरात्रों के विषय में जानते हैं चैत्र नवरात्र एवं आश्विन नवरात्र। चैत्र नवरात्रि गर्मियों के मौसम की शुरूआत करता है और प्रकृति माँ एक प्रमुख जलवायु परिवर्तन से गुजरती है। इस बार आश्विन नवरात्र का प्रारंभ 29 सितम्बर से हो रहा है जो 7 अक्टूबर तक रहेंगे। यह जानकारी वैदिक ज्योतिष संस्थान के अध्यक्ष स्वामी श्री पूर्णानंदपुरी जी महाराज ने दी।

परम पूज्य महामंडलेश्वर स्वामी श्री पूर्णानंदपुरी जी महाराज ने नवरात्र के विषय में जानकारी देते हुए बताया कि आश्विन नवरात्रि सबसे महत्वपूर्ण नवरात्रि है, जिसमें देवी शक्ति की पूजा की जाती है, रामायण के अनुसार भी भगवान राम ने आश्विन के महीने में देवी दुर्गा की उपासना कर रावण का वध कर विजय प्राप्त की थी। देवी दुर्गा के नौ रूप होते हैं, जिसमे पहले स्वरूप को पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण ‘शैलपुत्री’ नाम से जानी जातीं हैं। नवरात्र पर्व के दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना की जाती है। ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी यानी आचरण करने वाली। इस प्रकार ब्रह्मचारिणी का अर्थ हुआ तप का आचरण करने वाली। भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी।

माँ दुर्गाजी की तीसरी शक्ति को चंद्रघंटा के नाम से जाना जाता है, इस देवी के मस्तक पर घंटे के आकार का आधा चंद्र है। इसीलिए इस देवी को चंद्रघंटा कहा गया है। इनके शरीर का रंग सोने के समान बहुत चमकीला है। नवरात्र के चौथे दिन कूष्मांडा देवी के स्वरूप की ही उपासना की जाती है। कुम्हड़े की बलि प्रिय होने के कारण इनको कुष्मांडा कहते हैं। नवरात्रि का पाँचवाँ दिन स्कंदमाता की उपासना का दिन होता है। मोक्ष के द्वार खोलने वाली माता परम सुखदायी हैं। माँ अपने भक्तों की समस्त इच्छाओं की पूर्ति करती हैं। इस देवी की चार भुजाएं हैं। यह दायीं तरफ की ऊपर वाली भुजा से स्कंद को गोद में पकड़े हुए हैं। नीचे वाली भुजा में कमल का पुष्प है। बायीं तरफ ऊपर वाली भुजा में वरदमुद्रा में हैं और नीचे वाली भुजा में कमल पुष्प है।

माँ दुर्गा के छठे स्वरूप का कात्य गोत्र में विश्वप्रसिद्ध महर्षि कात्यायन घर पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण नाम कात्यायनी है, उस दिन साधक का मन ‘आज्ञा’ चक्र में स्थित होता है। योगसाधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।इनकी उपासना और आराधना से भक्तों को बड़ी आसानी से अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति होती है। उसके रोग, शोक, संताप और भय नष्ट हो जाते हैं। जन्मों के समस्त पाप भी नष्ट हो जाते हैं। माँ दुर्गाजी की सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती हैं। इस दिन साधक का मन ‘सहस्रार’ चक्र में स्थित रहता है। यह गर्दभ की सवारी करती हैं।

माँ दुर्गाजी की आठवीं शक्ति का नाम महागौरी है।इनकी शक्ति अमोघ और सद्यः फलदायिनी है। इनकी उपासना से भक्तों को सभी कल्मष धुल जाते हैं, पूर्वसंचित पाप भी विनष्ट हो जाते हैं।इनका रूप पूर्णतः गौर वर्ण है। इनकी उपमा शंख, चंद्र और कुंद के फूल से दी गई है। अष्टवर्षा भवेद् गौरी यानी इनकी आयु आठ साल की मानी गई है। इनके सभी आभूषण और वस्त्र सफेद हैं। इसीलिए उन्हें श्वेताम्बरधरा कहा गया है। 4 भुजाएं हैं और वाहन वृषभ है इसीलिए वृषारूढ़ा भी कहा गया है इनको।

सभी प्रकार की सिद्धियों को देने के कारण माँ दुर्गा की पूजा नवमी शक्ति सिद्धिदात्री नाम से जानी जाती है। इस दिन शास्त्रीय विधि-विधान और पूर्ण निष्ठा के साथ साधना करने वाले साधक को सभी सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है। भगवान शिव ने भी इस देवी की कृपा से यह तमाम सिद्धियां प्राप्त की थीं। इस देवी की कृपा से ही शिवजी का आधा शरीर देवी का हुआ था। इसी कारण शिव अर्द्धनारीश्वर नाम से प्रसिद्ध हुए।