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13 सितम्बर से शुरू श्राद्धपक्ष पित्रों की सेवा का महापर्व : स्वामी पूर्णानंदपुरी जी

Published: September 12, 2019 at 7:24 pm

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वीपीएल न्यूज़, अलीगढ़- पितृपक्ष अर्थात श्राद्धपक्ष भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से आश्चिन कृ्ष्ण अमावस्या तक रहते है,इस प्रकार प्रत्येक साल में पितृ पक्ष के 16 दिन विशेष रुप से व्यक्ति के पूर्वजों को समर्पित रह्ते है, पूर्वजों का मुक्ति मार्ग की ओर अग्रसर होना ही पितृ ऋण से मुक्ति दिलाता है, शास्त्रों के अनुसार माना जाता है कि जिनका देहांत हो चुका है और वे सभी इन दिनों में अपने सूक्ष्म रुप के साथ धरती पर आते हैं और अपने परिजनों का तर्पण स्वीकार करते हैं।श्राद्ध मध्यान्ह व्यापिनी तिथि एवं क़ुतुप काल (मध्यान्ह 12 बजे से 2 बजे तक) में किये जाते हैं अतः पूर्वजों को समर्पित यह महापर्व आज यानि शुक्रवार 13 सितम्बर से प्रारंभ हो रहा है। यह जानकारी वैदिक ज्योतिष संस्थान के संस्थापक एवं महामंडलेश्वर स्वामी श्री पूर्णानंदपुरी जी महाराज ने साझा की।

परम पूज्य गुरुदेव ने श्राद्धपक्ष की विस्तृत जानकारी देते हुए बताया कि श्राद्ध में उदया तिथि न लेकर मध्याह्न व्यापिनी तिथि ही ग्राही है अतः आज प्रातः 07:34 से पूर्णिमा तिथि प्रारंभ होकर 14 सितम्बर शनिवार को प्रातः 10:02 मिनट तक रहेगी। इसके चलते 13 सितम्बर यानी आज ही पूर्णिमा का श्राद्ध करना उचित रहेगा वहीँ प्रतिपदा का श्राद्ध 15 सितम्बर को रहेगा। अपने पूर्वज पितरों के प्रति श्रद्धा भावना रखते हुए पितृ पक्ष एवं श्राद्ध कर्म करना नितान्त आवश्यक है।

हिन्दू शास्त्रों में देवों को प्रसन्न करने से पहले, पितरों को प्रसन्न किया जाता है,देवताओ से पहले पितरो को प्रसन्न करना अधिक कल्याणकारी होता है।देवकार्य से भी पितृकार्य का विशेष महत्व होता है। वायु पुराण, मत्स्य पुराण, गरुण पुराण, विष्णु पुराण आदि पुराणों तथा अन्य शास्त्रों जैसे मनुस्मृति इत्यादि में भी श्राद्ध कर्म के महत्व के बारे में बताया गया है। पूर्णिमा से लेकर अमावस्या के मध्य की अवधि अर्थात पूरे 16 दिनों तक पूर्वजों की आत्मा की शान्ति के लिये कार्य किये जाते है।

स्वामी जी ने श्राद्ध से जुडी जानकारी को साझा करते हुए बताया कि जो व्यक्ति अपने पूर्वजों के निमित्त तिल (पित्रों के लिए), जौ(ऋषियों के लिए), चावल (देवताओं के लिए) एवं दूध आदि से तर्पण कर ब्राह्मणों को भोजन करवाने के बाद यथाशक्ति दान – दक्षिणा देता है, उसे पितृ-ऋण से मुक्ति मिलती है, साथ ही श्राद्ध से प्रसन्न होकर पितृ स्वास्थ्य समृ्द्धि, आयु व सुख शान्ति,संतान,कल्याण में वृद्धि करते हैं।

श्राद्धपक्ष भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से आश्चिन कृ्ष्ण अमावस्या के मध्य जो भी दान-धर्म किया जाता है। वह सीधा पितरों को प्राप्त होने की मान्यता है,पितरों तक यह भोजन ब्राह्मणों व पक्षियों के माध्यम से पहुंचता है। जिन व्यक्तियों की तिथि का ज्ञान न हो, उन सभी का श्राद्ध अमावस्या को किया जाता है,वहीँ जिन व्यक्तियों के पूर्वज इस लोक को छोड कर परलोक में वास कर रहे है, तथा इस लोक को छोडने का कारण अगर शस्त्र, विष या दुर्घटना आदि हो तो ऎसे पूर्वजों का श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को किया जाता है,व चतुर्दशी तिथि में लोक छोडने वाले व्यक्तियों का श्राद्ध अमावस्या तिथि में करने का विधान है।

महामंडलेश्वर स्वामी श्री पूर्णानंदपुरी जी महाराज ने बताया कि श्राद्ध कर्म या तर्पण करते समय चांदी के बर्तन का उपयोग करना चाहिए। पितरों को अर्घ्य देने के लिए, पिण्ड दान करने के लिए और ब्राह्मणों के भोजन के लिए चांदी के बर्तन श्रेष्ठ माने गए हैं। अगर चांदी के बर्तन नहीं है तो कांसे या तांबे के बर्तन का उपयोग कर सकते हैं। श्राद्ध कर्म के लिए गाय का दूध और गाय के दूध से बने घी, दही का उपयोग करना चाहिए। पितरों को धूप देते समय व्यक्ति को सीधे जमीन पर बैठना नहीं चाहिए। रेशमी, कंबल, ऊन, लकड़ी या कुश के आसन पर बैठकर ही श्राद्ध कर्म करना चाहिए।

श्राद्ध पक्ष में अगर कोई जरूरतमंद व्यक्ति दान लेने घर आता है तो उसे खाली हाथ नहीं जाने देना चाहिए। उसे खाना या धन का दान अवश्य करें। ब्राह्मण को स्वच्छ वर्तन में अथवा पत्तल पर भोजन कराने के बाद धन का दान करें और पूरे आदर-सम्मान के साथ उन्हें विदा करना चाहिए।पितृ पक्ष में क्लेश नहीं करना चाहिए। पति-पत्नी और परिवार के सभी सदस्यों को प्रेम से रहना चाहिए। जिन घरों में अशांति होती हैं, वहां पितरों की कृपा नहीं होती है।