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स्वामी प्रखर जी महाराज ने की श्रीराम कथा की अमृत वर्षा

Published: January 25, 2019 at 10:12 pm

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वीपीएल न्यूज़, 25 जनवरी 2019, प्रयागराज- परम् पूज्य अनन्त श्री विभूषित यज्ञ सम्राट महामण्डलेश्वर स्वामी श्री प्रखर जी महाराज के द्वारा पी.पी.एम. शिविर के प्रवचन पण्डाल में श्रीराम कथा, शिविर परिसर के बाहर प्रतिदिन अन्नक्षेत्र, प्रातः के समय प्रवचन पण्डाल में दण्डी स्वामियों को जलपान एवं पी.पी.एम. हॉस्पिटल में प्रतिदिन हजारों दर्शनार्थियों को जांच एवं स्वास्थ्य उपचार कर निःशुल्क दवाइयां भी वितरित की जा रही हैं। हॉस्पिटल में प्रातः से लेकर सायं तक निःशुल्क दवाई लेने वालों की लाइन लगी रहती है।

कुंभ मेला के मेलाधिकारी विजय किरन आनन्द ने भी हॉस्पिटल का निरीक्षण कर हॉस्पिटल की व्यवस्थाओं का अवलोकन किया तथा महाराज श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया तथा कहा कि मेला प्रशासन की ओर से मैं महाराज श्री का आभार प्रकट करता हूं जो महाराज श्री ने हॉस्पिटल में इतनी व्यापक व्यवस्था कर रखी है, मोबाइल वेंटिलेटर तक की व्यवस्था इस हॉस्पिटल में की गई बहुत गौरव की बात है तथा खुशी भी है कि ये सभी व्यवस्थाएं निःशुल्क हैं।

शिविर के प्रवचन पण्डाल में श्रीराम कथा के पंचम दिवस पर पूज्य महाराज श्री ने कथा सुनाते हुए कहा कि शतक्रतु के बड़े पुत्र थे राजा प्रतापभानु, छोटे पुत्र थे अरिमर्दन एवं एक सेनापति था। शतक्रतु के पुत्रों को ब्राह्मणों ने श्राप दे दिया कि तुम तीन जन्मों तक राक्षस के रूप में जन्म लोगे। पहले जन्म में हिरण्याक्ष के रूप में तथा दूसरे जन्म में रावण एवं कुंभकर्ण के रूप में। राजा प्रतापभानु ने रावण के रूप में जन्म लिया, अरिमर्दन ने कुंभकर्ण के रूप में तथा सेनापति ने विभीषण के रूप में जन्म लिया। रावण यद्यपि महर्षि अगत्स्य के कुल में जन्मा था किंतु श्राप के कारण राक्षस की योनि प्राप्त हुई। महाराज श्री ने रावण, कुंभकरण एवं विभीषण के तप को विस्तारपूर्वक समझाया तथा कहा कि स्वयं ब्रह्मा प्रकट हुए और ब्रह्मा जी ने वरदान मांगने को कहा। रावण ने ब्रह्मा जी से वरदान मांगा कि मेरा भोजन मनुष्य और वानर है इसलिए मनुष्य एवं वानर को छोड़कर किसी से भी न मरूं। रावण के बाद कुंभकरण ने वरदान मांगा कि मुझे वरदान दीजिए कि मैं 6 महीने तक आराम करूं और एक दिन के लिए जागकर, भोजन करने के बाद पुनः सो जाऊं। उसके बाद विभीषण ने वरदान मांगा, विभीषण बुद्धि के निर्मल थे उन्होंने वरदान मांगा कि प्रभु में मरा अनुराग बना रहे बस।

उन्होंने कहा कि इसके बाद रावण की शादी मंदोदरी से होने के बाद शेष दोनों भाइयों की भी शादी हो गई। ब्रह्मा जी की सृष्टि में एक बहुत सुंदर नगर था जिसकी दीवारे सोने की थीं तथा यक्षराज कुबेर ने एक करोड़ सैनिकों को भी वहीं रखा था। उस नगर का नाम था लंका, रावण को जब लंका के विषय में पता चला उसने लंका पर ही अपना आधिपत्य कर लिया। इस प्रकार रावण ने अनेकों अत्याचार किए। रावण के एक करोड़ पुत्र एवं सवा करोड़ नाती थे। रावण का बड़ा बेटा था मेघनाथ जो बहुत वीर था। रावण ने एक बार अपने परिवार की सभा बुलाई, सभा में रावण ने अपने परिवार के लोगों की संख्या देखी तो उसके मन में अहंकार बस गया, उसने सभा में निर्देश दिया कि हम लोग तभी शक्तिशाली बनेंगे जब देवता हमारे बंदी होंगे, उसने अपने बड़े पुत्र मेधनाथ को आदेश दिया कि जाओं ब्राह्मणों को मार डालों क्योंकि ब्राह्मण होंगे तो यज्ञ-यज्ञादि होते रहेंगे, श्राद्धकर्म भी होते रहेंगे जिससे देवता प्रसन्न होंगे इसलिए ब्राह्मणों की बस्ती में आग लगा दो, गौशालाओं में आग लगा दो क्योंकि गाय के घी से ये लाग यज्ञ आदि करेंगे तथा देवताओं को मेरे सामने बंदी बनाकर ले आओ।

आर्चाय डॉ. ब्रजेश शास्त्री जी ने वेद मंत्रों के जाप के साथ कथा प्रारंभ कराई। इस अवसर पर डॉ. सज्जन प्रसाद तिवारी, संत प्रवर आनंद ब्रह्मचारी जी महाराज एवं संत शिवप्रकाश ब्रह्मचारी ‘तूफानी बाबा’ जी उपस्थित रहे। श्री विश्वनाथ कानोडिया एवं श्री संतोष गर्ग ने यजमान के रूप में व्यास पीठ की आरती की।

कथा श्रवण करने वाले भक्तों में सर्वश्री अशोक जोशी, वीरेन्द्र व्यास, प्रकाश चंद मिततल, गौरी शंकर भारद्वाज, डॉ. जी.सी. पाठक, कनिष्क मेहता, अभिषेक कानोडिया, लवेश जिंदल, स्वाति मेहता, स्निग्धा अग्रवाल, आचार्य दिनेश शर्मा, डॉ. आई. सी. मूंदड़ा, दिनेश मिश्रा, सीताराम बडोनी, प्रेमाराम, गौरव, प्रजेश सिंघल, रामू आदि उपस्थित रहे।






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