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देवोत्थान एकादशी आज, देवोत्थान के 18 दिन बाद तक नहीं वैवाहिक कार्यों के मुहूर्त : ब्रजेश शास्त्री

Published: October 31, 2017 at 9:02 am

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वीपीएल न्यूज़, अलीगढ़- आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी और कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवउठनी एकादशी अथवा देवोत्थान कहते हैं। इस एकादशी को प्रबोधनी एकादशी भी कहा जाता है। देवशयनी एकादशी से देवउठनी एकादशी तक यानी चार महीने भगवान विष्णु शयनकाल की अवस्था में होते हैं और इस दौरान कोई शुभ कार्य जैसे, शादी, गृह प्रवेश या कोई भी मांगलिक कार्य नहीं किया जाता है। 31 अक्टूबर को भगवान विष्णु का शयनकाल खत्म हो रहा है और इसके बाद ही कोई शुभ कार्य होगा। यह जानकारी वैदिक ज्योतिष संस्थान के अध्यक्ष कैलाशी आचार्य डा.ब्रजेश शास्त्री ने दी।

श्री शास्त्री ने आगे बताया कि इसी दिन तुलसी के पौधे से भगवान विष्णु का विवाह होता है। इसीलिये देवउठनी एकादशी को तुलसी विवाह उत्सव भी कहा जाता है। देवउठनी एकादशी के बाद सभी तरह के शुभ कार्य शुरू हो जाते हैं, लेकिन इस बार देव जागने के 18 दिन बाद भी कोई वैवाहिक कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त नहीं है। दीपावली के बाद वर्ष पूर्ण होने में बचे लगभग दो माह में इस वर्ष विवाह के केवल 14 मुहूर्त हैं। 31 अक्टूबर को देवउठनी एकादशी है, लेकिन 13 अक्टूबर से देवगुरु बृहस्पति पश्चिामास्त हैं जो कि देवउठनी एकादशी के सात दिन बाद 7 नवंबर को पूर्व दिशा में उदित होंगे और आगामी तीन दिन बाल अवस्था में रहने के बाद 10 नवंबर को बालत्व निवृत्ति होगी। 16 नवंबर को सूर्य वृश्चिक राशि में प्रवेश करेगा। इन समस्त दोषों की निवृत्ति के पश्चात 19 नवंबर से शादियों की शुरुआत होगी।

तुलसी विवाह, देवउठनी एकादशी,देव प्रबोधनी एकादशी तिथि मान्यतानुसार कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन तुलसी जी और विष्णु जी का विवाह कराने की प्रथा है। तुलसी विवाह में तुलसी के पौधे और विष्णु जी की मूर्ति या शालिग्राम पाषाण का पूर्ण वैदिक रूपसे विवाह कराया जाताहै। तुलसी विवाह संपन्न कराने के लिए एकादशी के दिन व्रत करना चाहिए और तुलसी जी के साथ विष्णु जी की मूर्ति घर में स्थापित करनी चाहिए। तुलसी के पौधे और विष्णु जी की मूर्ति को पीले वस्त्रों से सजाना चाहिए क्योंकि पीला विष्णु जी की प्रिय रंग है। पौधे के चारों तरफ गन्ने का मंडप बनाना चाहिए। तुलसी जी के पौधे पर चुनरी या ओढ़नी चढ़ानी चाहिए। इसके बाद जिस प्रकार एक विवाह के रिवाज होते हैं। उसी तरह तुलसी विवाह की भी रस्में निभानी चाहिए। आचार्य डा.ब्रजेश शास्त्री ने देव उठनी एकादशी व्रत पूजा विधि के बारे में बताया कि इस एकादशी के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर सर्वप्रथम नित्यक्रिया से निपट कर स्नानादि कर स्वच्छ हो लेना चाहिये। स्नान किसी पवित्र धार्मिक तीर्थ स्थल, नदी, सरोवर अथवा कुंए पर किया जाये तो बहुत बेहतर अन्यथा घर पर भी स्वच्छ जल से किया जा सकता हैं।

स्नानादि के पश्चात निर्जला व्रत का संकल्प लेकर भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिये। सूर्योदय के समय सूर्य देव को अर्घ्य देना चाहिये। इस दिन संध्या काल में शालिग्राम रूप में भगवान श्री हरि का पूजन किया जाता है। रात्रि में प्रभु का जागरण भी किया जाता है। व्रत का पारण द्वादशी के दिन प्रात: काल ब्राह्मण को भोजन करवायें व दान-दक्षिणा देकर विदा करने के बाद किया जाता है। शास्त्रों में व्रत का पारण तुलसी के पत्ते से भी करने का विधान है।



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